श्रीमद भागवतम १ : नैमिशारण्य, नारद पूर्व जन्म कथा

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व्यास जी के शिष्य “रोमहर्ष” जी के बेटे  ज्ञानी उग्रश्रवा हिमालय पर्वत के दक्षिणी ढलावों पर नैमिषारण्य  पर पहुंचे, जहां पर शौनक जी अन्य ऋषियों के साथ यज्ञ कर रहे थे जिससे वहां कलियुग का प्रवेश नहीं हुआ था।  ऋषियों ने श्री सूत जी से विनम्र  प्रार्थना की कि कलियुग के अशुभ प्रभाव से बचने का कोई उत्तम उपाय बताएं।  तब उन्होंने भागवत कथा आरम्भ की।
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आचार्य व्यास जी के आश्रम के पास  सरस्वती नदी बहती थीं।  व्यास शून्य आँखों और अशांत मन से बहते पानी  को देख रहे थे, तभी वहां पर नारद मुनि  पधारे।  व्यास जी ने अति विनम्रता से पूछा, :

“हे मुनि नारद   , आगे समयक्रम में कलि  के प्रभाव से मानव अत्यधिक  दुखी रहेगा ।  इसीसे उसे बचाने के लिए मैंने एक ज्ञान को चतुर्वेदों में संपादित किया जिससे ज्ञान लुप्त न हो। कर्मकांडियों  के लिए वेद, और ज्ञानपिपासुओं के लिए उपनिषद लिखें |   फिर यह जानते हुए कि वेद पाठ हर मनुष्य को सुलभ नहीं, मैंने महाभारत कथानक लिखा, जिसमे गीता के माध्यम से वेदज्ञान का निचोड़ लोगों  तक पहुंचाया।  महाभारत में मानव के हर शुभ अशुभ कर्म के लक्षण और फल पर चिंतन है।  यह सब होने के बाद भी मेरा मन अशांत क्यों है ? मुझे अधूरे कर्म की अनुभूति क्यों हो रही है ?

मुनि नारद  ने कहा – हे ब्राह्मण – आपको यह अनुभूति इसलिए ही है कि आपका निश्चित कर्म अभी भी अधूरा ही है।

वेदव्यास जी ने बड़े ही विनम्र  भाव से इसका कारण और उपाय पूछा।  नारद जी बोले – आप  एक नवीन ग्रन्थ की रचना कीजिये  , जिसमे सिर्फ और सिर्फ प्रभु की अनंत लीलाओं का भक्ति विस्तार  में वर्णन हो , जिसे सुन / पढ़ कर मनुष्य  के मन में सहज ही उसके प्रति प्यार  और निश्छल भक्ति का प्रकाशित हो ।  इससे ही कलिकाल में मानव कलिप्रभाव की अग्नि से शीतलता पायेगा ।

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